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राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के एलेक्टेड मेम्बेर्स के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही चुनावी सरगर्मी बढ़ने लगी है। राजस्थान फार्मेसी कौंसिल पर अभी तक प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से राजस्थान केमिस्ट एसोसिएशन के जरिये मुख्यतः दवा व्यापारियों का ही कब्जा रहा है तथा अभी भी इनकी यह सल्तनत भंग होती प्रतीत नहीं हो रही है।

आज तक सभी चुनावों में केमिस्ट एसोसिएशन बिना अधिक प्रतिरोध के विजय प्राप्त करती नजर आई है। दवा व्यापार पर मुख्यतः दवा व्यापारियों का ही आधिपत्य है तथा इन दवा व्यापारियों में अधिकांश लोगों के पास ना तो फार्मेसी की डिग्री या डिप्लोमा है या फिर अनुभव से प्राप्त फार्मासिस्ट का सर्टिफिकेट है।

दरअसल कोई भी व्यक्ति फार्मासिस्ट की उपलब्धता दिखाकर दवा व्यापार कर सकता है। अभी कुछ समय पूर्ण होलसेल व्यापार में भी फार्मासिस्ट की अनिवार्यता की गई है वर्ना इसमें तो आज तक अनुभव से ही कार्य होता आया है।

जब बिना पढ़े लिखे सिर्फ अनुभव के आधार पर ऐसे कार्य करने का लाइसेंस मिल जाता है जिसको करने के लिए सिर्फ पढ़े लिखे तथा शिक्षित व्यक्तियों की जरूरत होती है तब इन अशिक्षित व्यक्तियों की नजर में उस शिक्षा का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। ऐसा ही कुछ फार्मेसी प्रोफेशन में हो रहा है। इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि कुछ राज्यों की केमिस्ट एसोसिएशन ने इस बाबत मांग की है कि दवा व्यापार में फार्मासिस्ट की अनिवार्यता समाप्त की जाए।

इनके अनुसार दवा का व्यापार किरणे के व्यापार से अलग कुछ नहीं हैं। दवा व्यापारियों की नजर में यह छवि बनाने में भी फार्मेसी प्रोफेशन के लोगों का ही हाथ है फिर चाहे इसमें वो फार्मासिस्ट हो जो अपना लाइसेंस कुछ रुपयों के लिए गिरवी रख देता है या फिर वो फार्मासिस्ट जो ड्रग डिपार्टमेंट में अधिकारी बनकर कुछ पैसे के लिए अपना ईमान बेचकर गलत कार्यों में साथ दे देते हैं।

दरअसल इस प्रोफेशन में बहुत सी समस्याएँ हैं या फिर हम ये कह सकते हैं कि यह प्रोफेशन अभी तक भी सिर्फ अपनी पहचान बनाने के लिए ही संघर्षरत है। इस प्रोफेशन का भला ना तो आज तक फार्मेसी फील्ड के तथाकथित पुरोधा कर पाए हैं तथा ना ही उनकी इसमें कोई रुचि रही है। सभी में काम करने की नहीं बल्कि श्रेय लेने की होड़ मची रहती है।

फार्मेसी के तथाकथित वरिष्ठ जनों का जमावड़ा भी सिर्फ परंपरागत रस्मों को निभाने के लिए ही होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो यह बहुत डरपोक कम्युनिटी है जहाँ लोग प्रतीकार करने से डरते हैं या फिर सभी लोग अपने निजी स्वार्थों को साधने में लगे रहते हैं। दरअसल फार्मेसी प्रोफेशन के लोग ही इस प्रोफेशन को दीमक की तरह खा रहे हैं।

फार्मेसी प्रोफेशन की परेशानियों के सम्बन्ध में इतने अधिक बिंदु हैं कि अगर हम इनको इंगित करना शुरू करें तो एक पूरी किताब लिखी जा सकती है। हम समय समय पर इस प्रोफेशन की इन कमियों पर आपका ध्यान आकृष्ट करते रहेंगे बहरहाल अभी मुद्दा सिर्फ राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के चुनाव का है इसलिए आज हम सिर्फ इसी मुद्दे पर बात करेंगे।

पता नहीं राजस्थान फार्मेसी कौंसिल के सदस्यों को ऐसी कौनसी दैवीय शक्तियाँ प्राप्त होती है कि जिसका मोह सभी को इस चुनाव की तरफ खींच रहा है। शायद इसी लिए राजस्थान फार्मेसी कौंसिल अपने आप को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने का भरसक प्रयास कर रही है ताकि इनकी इन दैवीय शक्तियों को गुप्त रख बरकरार रखा जा सके।

वैसे यह बड़ा मनोरंजक तथ्य है कि फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया सूचना के अधिकार के दायरे में आती है तथा सभी तरह की सूचनाएँ उपलब्ध करवाती है परन्तु राजस्थान फार्मेसी कौंसिल सूचना के अधिकार से बाहर है।

शायद राजस्थान फार्मेसी कौंसिल का यही रहस्यमय लालच सभी को इन चुनाओं की तरफ आकर्षित कर रहा है। अभी तक गिने चुने लोग ही इन चुनाओं में भाग लेकर हर बार विजय प्राप्त करते रहे हैं। ये उम्मीद्वार अधिकांशतः या तो केमिस्ट एसोसिएशन के मेम्बेर्स होते हैं या फिर फार्मेसी फील्ड के वे लोग जो इस एसोसिएशन द्वारा समर्थित होते हैं।

परन्तु इस बार ऐसा लग रहा है कि इन चुनाओं में कुछ दम होगा क्योंकि इस बार तीन-तीन पैनल बनाकर चुनाव लड़ा जा रहा है। केमिस्ट एसोसिएशन के पैनल के अतिरिक्त अन्य दो पैनल और हैं जो अपने आप को फार्मासिस्टों का पैनल होने का दावा कर रहे हैं। दोनों ही पैनल के लोग अपनी लड़ाई केमिस्टों से होने का दावा कर रहे हैं। दोनों पैनलों में एक पैनल कॉमन पैनल के नाम से चुनाव लड़ रहा है तथा दूसरा पैनल अपने आप को छात्र तथा फार्मासिस्ट हितैषी होने का दावा कर रहा है।

इन दोनों पैनलों की सबसे बड़ी गलती यह है कि इन्होंने केमिस्ट तथा फार्मासिस्ट दोनों को अलग-अलग कर दिया तथा जाने अनजाने में अपने आप को फार्मासिस्ट तथा केमिस्ट एसोसिएशन के मेम्बेर्स को केमिस्ट नाम से संबोधित करने लगे। हमें यह भली भाँति समझना होगा कि फार्मासिस्ट तथा केमिस्ट अलग-अलग नहीं है बल्कि ये एक दूसरे के पूरक हैं। दरअसल फार्मासिस्ट की केमिस्ट होता है।

हम दवा व्यापारियों को केमिस्ट नाम से संबोधित करके उनको हमारा नाम दे रहे हैं। आखिर हम बिना फार्मेसी की पढाई किए हुए दवा व्यापारी को केमिस्ट नाम से संबोधित क्यों कर रहे हैं? क्या कोई अनपढ़ व्यक्ति मात्र दवा की दुकान शुरू करने से केमिस्ट बन सकता है, अगर ऐसा है तो फिर वाकई हमारी शिक्षा प्रणाली लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली से भी आगे निकल गई है।

कॉमन पैनल में फार्मेसी क्षेत्र के काफी वरिष्ठ लोग हैं जो टीचिंग कम्युनिटी से बतौर प्रिंसिपल तथा डायरेक्टर, राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस से बतौर डिप्टी रजिस्ट्रार, ड्रग डिपार्टमेंट से बतौर ड्रग कंट्रोल ऑफिसर तथा असिस्टेंट ड्रग कंट्रोलर, दवा व्यापार से बतौर दवा व्यापारी तथा चिकित्सा विभाग से बतौर गवर्नमेंट फार्मासिस्ट के रूप में जुड़े हुए हैं। दूसरे पैनल का कोई नाम नहीं है परन्तु यह पैनल मुख्यतः फार्मेसी क्षेत्र के छात्र नेताओं का है जो फार्मासिस्ट के अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं जिसमे अन्य क्षेत्र के लोग भी शामिल है।

कॉमन पैनल नाम सभी फार्मासिस्टों में एक कंफ्यूजन पैदा कर रहा है तथा इस नाम से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह पैनल केमिस्टों द्वारा समर्थित फार्मासिस्टों का पैनल है जिसमे केमिस्टों की अहम भूमिका है। कॉमन पैनल के उम्मीद्वारों को यह शंका दूर करनी चाहिए। वैसे भी कॉमन पैनल के लगभग सभी लोग फार्मेसी प्रोफेशन की सभी परेशानियों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं।

ये लोग अपने निजी जीवन में अच्छी तरह से स्थापित लोग हैं। यह सर्वज्ञात है कि जब पेट भरा होता है तब सूखी रोटी अच्छी नहीं लगती, हाँ, ड्राई फ्रूट्स जरूर खाए जा सकते हैं। हमारे विचार से इस पैनल से शायद राकेश जाट इकलौते ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्होंने फार्मेसी प्रोफेशन में काफी परेशानियों का सामना किया है तथा मुखर स्पष्टवक्ता हैं।

फार्मासिस्टों को मतदान करने से पूर्व यह विश्लेषण अच्छी तरह कर लेना चाहिए कि फार्मेसी प्रोफेशन के लिए आज तक इन सभी लोगों का क्या योगदान रहा है? इन लोगों ने फार्मासिस्टों के अधिकारों के लिए आखिर ऐसे कौन-कौन से उल्लेखनीय कार्य किए हैं? फार्मासिस्टों की बेरोजगारी को दूर करने के लिए इन्होंने कौनसे कदम उठाये हैं?

फार्मेसी टीचिंग में टीचर्स के लिए भी काफी इश्यूज है, वरिष्ठजनों ने टीचर्स के लिए आखिर आज तक क्या किया है जबकी ये स्वयं कई जगह फार्मेसी कौंसिल ऑफ इंडिया के इंस्पेक्टर्स बन कर पर्यटन पर जा चुके हैं। इन्होंने कितने इंस्पेक्शन में टीचर्स की सैलरी तथा उनकी जॉब सिक्यूरिटी के लिए रिमार्क लगाया है तथा कितने अनियमितताओं वाले कॉलेजों को बंद करवाया है? यूनिवर्सिटी प्रशासन ने टीचर्स के भले के लिए क्या कदम उठायें हैं?

दूसरे पैनल में सर्वेश्वर शर्मा के नेतृत्व चुनाव लड़ा जा रहा है। यह एक कडवी सच्चाई है कि वर्ष 2011 से पूर्व राजस्थान में फार्मासिस्ट की कोई पहचान नहीं थी। यह पहचान तब बनी जब राजस्थान सरकार ने सरकारी अस्पतालों के लिए फार्मासिस्टों की भर्ती शुरू की। इस भर्ती प्रक्रिया को पूर्ण करवाने का श्रेय छात्र नेता प्रवीण सेन तथा उनके संगठन को जाता है। इसके बाद की भर्तियों में तथा फार्मासिस्टों के अधिकारों के लिए इस लड़ाई में सर्वेश्वर शर्मा तथा उनका संगठन भी शामिल हुआ तथा आज भी अनवरत रूप से सक्रिय है।

वर्तमान में इन दोनों के अतिरिक्त अन्य कई छात्र नेता भी फार्मासिस्ट के अधिकारों के लिए अपने-अपने क्षेत्र में संघर्षरत हो चुके हैं। ये लोग जमीन से उठे हुए तथा फार्मासिस्टों के लिए मैदान में तथा सड़क पर सक्रिय हैं। सभी मतदाताओं को वोट करते समय इन छात्र नेताओं के संघर्ष तथा योगदान को कदापि नहीं भूलना चाहिए।

वैसे भी राजस्थान फार्मेसी कौंसिल की चुनावी प्रक्रिया भी शक के घेरे में हैं। आज के इस डिजिटल युग में जब हमारे माननीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पूर्ण डिजिटलाइजेशन की तरफ बढ़ रहे हैं तब राजस्थान फार्मेसी कौंसिल बाबा आदम के जमाने की चुनाव प्रक्रिया पर जोर डाल रही है। आज भी मतपत्र डाक द्वारा भेजें जाते हैं तथा सारी चुनावी प्रक्रिया भारतीय डाक पर निर्भर हो गई है। ज्ञातव्य है कि यह वही कौंसिल है जो अपने आप को पूर्ण रूप से ऑनलाइन होने का दावा कर रही है।

डाक द्वारा भेजे गए मतपत्र सक्षम उम्मीद्वारों या उनके संगठन द्वारा इकट्ठे कर लिए जाने का आरोप हमेशा से लगता रहा है। हद तो तब हो जाती है जब खाली मतपत्र इकट्ठे करने का आरोप भी लग जाता है। यह मतपत्र प्रलोभनों से या फिर भय दिखाकर इकठ्ठा करना बहुत आसान है। दरअसल राजस्थान फार्मेसी कौंसिल की चुनाव प्रक्रिया ही निराली है जिसमे सरकारी सेवा में रहने वाले लोग भी चुनाव लड़ सकते हैं।

मेडिकल स्टोर का निरीक्षण करने वाले ड्रग डिपार्टमेंट के अधिकारी ही जब चुनाव लड़ेंगे तो फिर मेडिकल स्टोर वाले किस तरीके से उनके दबाब का सामना कर पाएँगे? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि व्यापारियों को अपना व्यापार बिना बाधा के करना होता है। अगर एक मतपत्र देने से ये लोग आगामी परेशानियों से बच सकते हैं तो फिर क्या गलत कर रहे हैं?

छात्र नेता प्रवीण सेन ने भी एक इंटरव्यू में राजस्थान फार्मेसी कौंसिल की चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। ज्ञातव्य है कि प्रवीण सेन वर्ष 2013 में चुनाव लड़ चुके हैं तथा पहले भी कौंसिल की चुनाव प्रक्रिया पर दोषपूर्ण होने का आरोप लगा चुके हैं।

यह दोषपूर्ण प्रणाली बंद होनी चाहिए तथा मतदान डाक द्वारा न होकर गुप्त रूप से व्यक्तिगत उपस्थिति के साथ होना चाहिए जैसे बार कौंसिल में होता है। गुप्त मतदान में किसी का कोई भय नहीं होता है तथा मतदान भी निष्पक्ष होता है।

फार्मेसी कौंसिल के चुनाव में वोटर्स वे सभी रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट हैं जो बहुत से अलग-अलग व्यवसायों से जुड़े हुए हैं। इन सभी फार्मासिस्टों को उचित रूप से यह आंकलन करना होगा कि इन पैनल वालों ने उनके लिए आज तक क्या-क्या कार्य किए हैं। सभी उम्मीद्वारों की निजी उपलब्धियों को ध्यान में रखकर वोट करना चाहिए। फार्मासिस्टों को अपना मत सिर्फ इसी लिए किसी को नहीं देना चाहिए कि या तो उसका निजी हित सिद्ध हो रहा है या सामने वाला गुरु दक्षिणा में उनका मत मांग रहा है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव एक तरह का युद्ध होता है जिसमे ना तो कोई गुरु होता है तथा ना ही कोई शिष्य। अगर यहाँ भी गुरु शिष्य का रिश्ता आ जाता है तो फिर निष्पक्षता तथा नैतिकता दोनों ही खतरे में आ जाती है। अतः वोट सिर्फ उन्ही उम्मीद्वारों को दें जो आपके हितों के लिए लड़ने में सक्षम हो तथा जिसकी पुरानी प्रष्ठभूमि फार्मासिस्टों के लिए लड़ने वाली रही हो ताकि ये लोग कौंसिल में पहुँच कर कुछ नया कर पाएँ।

आओ फार्मासिस्ट भाइयों, पैनल-पैनल खेलें Come pharmacy people, play panel-panel